खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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खूनी हवेली की वासना compleet

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:51

खूनी हवेली की वासना पार्ट --1

गतान्क से आगे........................

किसी शायर ने क्या खूब कहा है

सोचो तो बड़ी बात है तमीज़ जिस्म की,

वरना तो ये सिर्फ़ आग बुझाने के लिए हैं ......

यही सोचती वो खामोशी से आगे बढ़ी. ये बात कितनी सच थी इस बात का अंदाज़ा उसको बहुत अच्छी तरह से हो गया था. हाथ में चाइ की ट्रे लिए वो ठाकुर के कमरे की तरफ बढ़ी पर ये ट्रे पर रखी चाइ तो सिर्फ़ एक बहाना थी. असल में तो वो ठाकुर को अपना जिस्म परोसने जा रही थी.

ये किस्सा ऐसी ही जाने कब्से चला आ रहा था. वो रोज़ रात को 9 बजे ठाकुर को चाइ देने के बहाने उसके कमरे में जाती. चाइ को वॉश बेसिन में गिराकर कप को खाली कर देती जिससे देखने वाले को लगे के चाइ ठाकुर ने पी ली, और फिर ठाकुर को अपना जिस्म परोसती और 15 मिनट बाद कमरे से बाहर आ जाती. यूँ तो ये चाइ का नाटक ज़रूरी नही था क्यूंकी रात के 9 बजने तक हवेली में रहने वाला हर कोई अपने कमरे में बंद हो जाता था और अगर वो यूँ भी ठाकुर के कमरे में चली जाती तो ना कोई देखता ना सवाल करता पर फिर भी वो रोज़ाना चाइ लेकर ही जाती थी. या तो इसको शरम कह लो या बस अपने दिल को बहलाने का एक बहाना, पर ट्रे में चाइ रोज़ाना होती थी.

रोज़ की तरह आज भी उसने ठाकुर के कमरे पर हल्की सी दस्तक दी और बिना जवाब का इंतेज़ार किए अंदर दाखिल हो गयी. कमरे में कोई नही था पर बाथरूम से शवर की आवाज़ आ रही थी. वो समझ गयी के ठाकुर नहा रहा था. ट्रे टेबल पर रखी और कप उठाकर रोज़ाना की तरह बाथरूम की तरफ बढ़ी.

बाथरूम का दरवाज़ा खुला हुआ था. वो दरवाज़े के पास पहुँची तो अंदर ठाकुर शवर के नीचे पूरा नंगा खड़ा हुआ था. उसने ठाकुर पर एक नज़र डाली और ठाकुर की नज़र उसपर पड़ी. ठाकुर के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई और उसे देखकर अपने लंड धीरे धीरे हिलाते हुए उसको बिस्तर की तरफ जाने का इशारा किया.

हाथ में पकड़े कप से उसने चाइ वहीं वॉश बेसिन में गिराई और फिर वापिस कमरे में आ गयी. कमरे में आकर कप वापिस ट्रे पर रखा और चुप चाप वहीं बिस्तर के किनारे खड़ी हो गयी.

कुच्छ पल बाद ही ठाकुर भी बाथरूम से नंगा ही बाहर आ गया. एक पल के लिए ठाकुर ने उसको देखा और फिर उसकी टाँगो की तरफ नज़र डाली. वो इशारा समझ गयी और चुप चाप अपनी कमीज़ उपेर उठाकर सलवार का नाडा खोलने लगी.

जब तक सलवार का नाडा खुलता, ठाकुर उसके पिछे आ चुका था. सलवार ढीली होते ही पिछे से ठाकुर ने उसकी सलवार को पकड़कर हल्का सा नीचे खींच दिया और उसकी गांद को नंगा कर दिया. कमरे में चल रहे ए.सी. की ठंडी हवा और ठाकुर का गीला हाथ उसकी नंगी गांद में एक ठंडक की सिहरन दौड़ा गया. ठाकुर थोडा और नज़दीक आया तो खड़ा लंड उसकी गांद से रगड़ने लगा. आगे क्या करना है वो जानती थी और अपने हाथ बिस्तर पर रखकर झुक गयी.

पीछे से ठाकुर ने अपना लंड निशाने पर लगाया और धीरे धीरे पूरा का पूरा उसकी चूत में दाखिल कर दिया. लंड के पूरा अंदर होते ही खुद उसके मुँह से भी एक आह निकल पड़ी. भले वो कितना अपने दिल को समझाती, कितना शराफ़त के पर्दों में छुपाटी, वो ये बात अच्छी तरफ से जानती थी के खुद उसका जिस्म भी उसको दॉखा दे जाता था. और आज भी कुच्छ ऐसा हो रहा था. ठाकुर पिछे से उसकी चूत पर धक्के लगा रहा था और वो खुद भी बेहेक्ति जा रही थी.

एक नज़र उसने कमरे में फुल साइज़ मिरर पर डाली तो खुद उसका जोश दुगुना हो गया. वो बिस्तर के किनारे पर हाथ रखे झुकी खड़ी थी. सलवार ढीली हल्की सी नीचे हो रखी थी. बस इतनी ही के ठाकुर के लिए पिछे से लंड डालना मुमकिन हो सके. उसको खुद अपने जिस्म का कोई हिस्सा शीशे में नज़र नही आ रहा था पर फिर भी वो इस वक़्त एक तरह से पूरी नंगी थी.

ठाकुर की स्पीड बढ़ती चली गयी और धक्को में दुगुनी रफ़्तार आ गयी. गांद पर पड़ रहे पुर ज़ोर के धक्को के कारण उसके पावं लड़खड़ा गये और वो बिस्तर पर आगे की और हुई और उल्टी लेट गयी. अब ठाकुर उसकी गांद पर बैठा था और उसके दोनो कूल्हो को पकड़े पूरी जान से धक्के लगा रहा था. वो जानती थी के काम ख़तम होने वाला है. तेज़ी से पड़ते धक्को ने उसकी चूत में जैसे आग सी लगा दी. दोनो हाथों से उसके अपनी मुट्ठी में चादर को ज़ोर से पकड़ लिया और आँखें मूंद ली ...... और जैसी उसकी चूत से नदियाँ बह चली.

और ठीक उसी वक़्त ठाकुर के मुँह से ज़ोर की आह निकली और लंड से निकला वीर्य उसकी चूत में भरने लगा. वो खुद भी झाड़ रही थी, चूत की गर्मी पानी और वीर्य बनकर उसकी चूत से बह रही थी.

थोड़ी देर बाद हाथ में ट्रे उठाए, अपने कपड़े ठीक करती वो कमरे से बाहर निकली. उसपर एक नज़र डालते ही कोई भी कह सकता था के वो अभी अभी चुद्कर आई है पर नज़र डालने वाला था ही कौन. चुप चाप वो किचन तक पहुँची औट ट्रे वहीं छ्चोड़कर अपने कमरे की तरफ बढ़ चली. कमरे में जाकर उसने एक छ्होटी सी गोली पानी के साथ खाई ताकि उसको ठाकुर का बच्चा ना ठहर जाए और बिस्तर पर लेट गयी.

थोड़ी ही देर बाद पूरी हवेली एक चीख की आवाज़ से गूँज उठी.

नींद की उबासी लेती वो अपने कमरे की तरफ बढ़ी. ड्रॉयिंग रूम में घड़ी पर नज़र डाली तो 9.15 बज रहे थे. यूँ तो वो अक्सर रात को देर तक जागती रहती थी पर आज सुबह से ही काम इतना ज़्यादा था के हालत खराब हो रखी थी.

अपने कमरे तक पहुँचकर वो अंदर दाखिल होने ही लगी थी के याद आया के दोपहर के सुखाए कपड़े अभी भी हवेली के पिच्छले हिस्से में अब भी सूख रहे हैं. एक पल को उसने सोचा के कपड़े सुबह जाकर ले आए पर वो जानती के बाहर आसमान पर बदल छाए हुए हैं और रात को बारिश हो सकती थी. मौसम को कोस्ती वो हवेली के पिच्छले दरवाज़े की तरफ चली.

बाहर आकर उसने एक एक करके अपने सारे कपड़े उतारे. जहाँ वो खड़ी थी वहाँ से ठाकुर के कमरे की खिड़की सॉफ नज़र आती थी. कमरे की लाइट जली हुई थी.

कपड़े लेकर वो वापिस अंदर जाने लगी तो एक नज़र ठाकुर के खिड़की पर फिर पड़ी और कमरे के अंदर उसको ठाकुर खड़े हुए दिखाई दिए. यूँ तो ये कोई ख़ास बात नही थी क्यूंकी कमरा खुद उन्ही का था पर जिस बात ने उसके पैर रोक दिए वो थे उनके चेहरे पर आते जाते हुए भाव. लग रहा था जैसे ख़ासी तकलीफ़ में है. कमरे की खिड़की ज़रा ऊँची थी इसलिए उसको सिर्फ़ उनका सर और कंधे नज़र आ रहे थे जो नंगे थे पर इस बात का अंदाज़ा उसको हो गया के ठाकुर साहब उपेर से नंगे थे. दूसरी बात जो उसको थोड़ा अजीब लगी के उनका पूरा जिस्म हिल रहा था और चेहरे के भाव बदल रहे थे.

जाने क्या सोचकर वो खिड़की के थोड़ा नज़दीक आई. क्यूंकी खिड़की उसके खुद की हाइट से ऊँची थी इसलिए जब वो खिड़की के पास आकर खड़ी हुई तो अंदर कुच्छ भी दिखाई देना बंद हो गया. पर तभी उसके कानो में एक आवाज़ पड़ी जिससे उसके दोनो कान खड़े हो गये. आवाज़ एक औरत की थी. थोड़ी देर खामोशी हुई और फिर से वही एक औरत की आवाज़ आई, और फिर आई, और फिर आई और फिर रुक रुक कर आवाज़ आती रही.

वो एक मिनट तक चुप चाप खड़ी वो आवाज़ सुनती रही. एक पल के लिए उसके कदम वापिस हवेली के दरवाज़े की ओर बढ़े और फिर ना जाने क्यूँ रुक गये.वो अच्छी तरह जानती थी के कमरे के अंदर क्या हो रहा है और एक औरत इस तरह की आवाज़ किस वक़्त निकालती है. वो समझ गयी थी के क्यूँ ठाकुर के कंधे नंगे थे और क्यूँ उनके चेहरे के भाव बदल रहे थे.

"अंदर कमरे में वो औरत ठाकुर साहब से चुद रही है"

ये ख्याल दिल में आया ही था के उसके जिस्म में एक सनसनी सी दौड़ गयी. घुटने जैसे कमज़ोर पड़ने लगी और टाँगो के बीच की जगह अपने आप गीली सी होने लगी. उसको खुद को याद नही था के वो आखरी बार कब चुदी थी. अक्सर रात को चूत में एक अजीब बेचैनी सी होती और वो यूँ ही करवटें बदलती रहती थी और कभी कभी तकिया उठाकर अपनी टाँगो के बीच दबा लेती थी. उसका एक हाथ अपने आप ही उसकी चूत पर चला गया और उसने पास पड़ा एक पत्थर लुढ़का कर खिड़की के पास किया. एक पावं उसने पत्थर पर रखा और धीरे से खिड़की से झाँक कर अंदर देखा.

अंदर का माजरा देखकर उसके मुँह से आह निकलते निकलते रह गयी. एक औरत बिस्तर पर उल्टी पड़ी हुई थी और ठाकुर साहब नंगे उसके उपेर सवार थे. औरत ने अपने चेहरा बिस्तर में घुसा रखा था और ठाकुर के हर धक्के पर घुटि घुटि सी आवाज़ निकलती थी. बिस्तर पर चादर बिछि होने के कारण और उस औरत के उल्टी होने से वो चाहकर भी ये ने देख पाई के बिस्तर पर कौन चुद रही है. औरत ने कपड़े पूरे पहेन रखे थे पर जिस तरह से ठाकुर साहब ने उसकी गांद पकड़ रखी थी और धक्के लगा रहे थे वो समझ गयी के अंदर बिस्तर पर पड़ी औरत ने सलवार नीचे सरका रखी थी और ठाकुर पिछे से चूत मार रहे थे.

वहीं खड़े खड़े उसने अपना एक हाथ अपनी चूत पर रगड़ना शुरू कर दिया और ध्यान से ठाकुर का नंगा जिस्म देखने लगी. चौड़े कंधे, कसरती और तना हुआ शरीर, वो डैड दिए बिना ना रह सकी. धीरे धीरे उसकी नज़र ठाकुर की टाँगो के बीच पहुँची और उसके दिल में चाह उठी के एक बार ठाकुर का लंड दिखाई दे. पर वो तो उस औरत की गांद के अंदर कहीं छुपा हुआ था. वो बाहर खड़ी बेसब्री से इंतेज़ार करने लगी के चुदाई का खेल ख़तम हो और ठाकुर लंड बाहर निकले ताकि वो उसको लंड के दर्शन हो सकें. ठाकुर का शानदार जिस्म देखकर उसके दिमाग़ में सिर्फ़ ठकुराइन के लिए अफ़सोस और ठाकुर के लिए हमदर्दी आई.

इसी इंतेज़ार में वो बाहर खड़ी चूत पर हाथ चला रही थी के ठाकुर ने एक झटका पूरे ज़ोर से मारा और बिस्तर पर पड़ी औरत ने दर्द और मज़े के कारण एक पल के लिए अपना चेहरा उपेर किया. बाहर खड़े उसका हाथ फ़ौरन चूत पर चलना बंद हो गया. उसको आँखें हैरत से फेल्ती चली गयी. उसको यकीन नही हुआ के बिस्तर पर वही औरत है जो उसको एक पल के लिए लगा के है. उसको यकीन था के उसकी आँखें धोखा खा रही है. उसने फिर गौर से देखने की कोशिश में अपनी नज़र अंदर गढ़ाई पर नज़र ठाकुर की टाँगों के बीच नही, उस औरत के चेहरे की तरफ थी.

अचानक उसको अपने पिछे कुच्छ आवाज़ महसूस हुई. किसी के चलने की आवाज़ थी जो नज़दीक थी और वो समझ गयी की कोई इसी तरफ आ रहा था. जल्दी से वो खिड़की से हटी और हवेली के दरवाज़े की तरफ बढ़ी. दिमाग़ अब भी हैरत में था के क्या सच में ठाकुर के बिस्तर पर वही औरत है जो उसको लगा के है? यही सोचती वो अपने कमरे तक पहुचि.

थोड़ी ही देर बाद पूरी हवेली एक चीख की आवाज़ से गूँज उठी.

"आअहह ... और ज़ोर से"

नीचे लेटी हुई मज़े में आहें भरते हुए बोली. तेजविंदर उसके उपेर लेटा हुआ था. वो दोनो ही पूरी तरह नंगे थे. रेखा की दोनो टांगे हवा में, टाँगो के बीच तेजविंदर, दोनो छातियाँ तेजविंदर के हाथों में और लंड चूत में तेज़ी से अंदर बाहर हो रहा था.

रेखा की उमर 40 के पार थी, शकल सूरत भी कोई ख़ास नही पर जिस्म ऐसा था के 20 साल की लड़की को मात दे जाए और यही वजह थी के तेज हर रात उसी के पास खींचा चला आता था. यूँ तो बाज़ार में एक से बढ़के एक हसीन थी पर रेखा को चोदने के बाज़ शायद ही कभी ऐसा हुआ था के तेज किसी और रंडी के पास गया था.

"कमाल है तेरी चूत" वो पूरी जान से धक्के मारता हुआ बोला "साला लंड घुसाओ तो ऐसा लगता है जैसे किसी 15-16 साल की लड़की की चूत में लंड घुसाया हो"

"तो आपका लंड कौन सा कम है. जो आपके नीचे से निकल गयी, कसम ख़ाके कहती हूँ के किसी और के सामने अपना भोसड़ा खोलेगी नही" मुस्कुराते हुए रेखा ने जवाब दिया

"तुम तो खोलती हो" तेज ने उसको छेड़ते हुए कहा

"आप रोज़ रात आने का वादा कीजिए. कसम है मुझे अगर इस चूत की हवा भी किसी और लंड को लगे"

उसकी बात सुनकर तेज हल्का सा हसा और फिर पूरी जान से धक्के लगाने लगा

"आआहह ठाकुर साहब धीएरे ..... "रेखा की मुँह से निकला पर तेज नही रुका और अगले 5 मिनिट तक उसने रेखा का जैसे बिस्तर पर पागल बना दिया. कभी चूचियाँ दबाता, कभी चूस्ता, कभी काट लेता, कभी दोनो टांगे हवा में होती तो कभी बिस्तर पर पर धक्को की तेज़ी में कोई कमी नही आई. आख़िर 5 मिनट बाद तेज तक कर साँस लेने के लिए रुका. वो रुका तो रेखा की जान में भी जान आई.

"ठाकुर साहब" वो हाँफती हुई बोली "मेरी चूत क्या आज रात गाओं छ्चोड़कर जा रही है जो ऐसे चोद रहे हो"

तेज हस्ते हुए अपने माथे से पसीना पोंच्छने लगा

"थक गये हैं" रेखा ने प्यार से बालों में हाथ फिराते हुए कहा "मैं उपेर आ जाऊं?"

"रंडी होकर ठाकुरों के उपेर आने का सपना देख रही हो?" तेज ने कहा

ये बात जैसे रेखा के दिल में नश्तर की तरह चुध गयी. उसने तो प्यार में आकर तेज से उपेर आने को कही थी ताकि वो आराम से नीचे लेट जाए पर उसके बदले में जब तेज का का जवाब सुना तो एकदम गुस्से में किलस गयी.

क्रमशः........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:52

खूनी हवेली की वासना पार्ट --1

gataank se aage........................

Kisi shayar ne kya khoob kaha hai

Socho to badi baat hai tameez jism ki,

warna to ye sirf aag bujhane ke liye hain ......

Yahi sochti vo khamoshi se aage badhi. Ye baat kitni sach thi is baat ka andaza usko bahut achhi tarah se ho gaya tha. Haath mein chaai ki tray liye vo Thakur ke kamre ki taraf badhi par ye tray par rakhi chaai toh sirf ek bahana thi. Asal mein toh vo Thakur ko apna jism parosne ja rahi thi.

Ye kissa aisi hi jaane kabse chala aa raha tha. Vo roz raat ko 9 baje thakur ko chaai dene ke bahane uske kamre mein jaati. Chaai ko wash basin mein girakar cup ko khaali kar deti jisse dekhne wale ko lage ke chaai thakur ne pi li, aur phir thakur ko apna jism parosti aur 15 min baad kamre se bahar aa jaati. Yun toh ye chaai ka natak zaroori nahi tha kyunki raat ke 9 bajne tak Haweli mein rehne wala har koi apne kamre mein band ho jata tha aur agar vo yun bhi thakur ke kamre mein chali jaati toh na koi dekhta na sawal karta par phir bhi vo rozana chaai lekar hi jaati thi. Ya toh isko sharam keh lo ya bas apne dil ko behlane ka ek bahana, par tray mein chaai rozana hoti thi.

Roz ki tarah aaj bhi usne thakur ke kamre par halki si dastak di aur bina jawab ka intezaar kiye andar daakhil ho gayi. Kamre mein koi nahi tha par bathroom se shower ki aawaz aa rahi thi. Vo samajh gayi ke thakur naha raha tha. Tray table par rakhi aur cup uthakar rozana ki tarah bathroom ki taraf badhi.

Bathroom ka darwaza khula hua tha. Vo darwaze ke paas pahunchi toh andar thakur shower ke neeche poora nanga khada hua tha. Usne thakur par ek nazar daali aur thakur ki nazar uspar padi. Thakur ke chehre par ek halki si muskaan aayi aur use dekhkar apne lund dheree dheere hilate hue usko bistar ki taraf jaane ka ishara kiya.

Haath mein pakde cup se usne chaai vahin wash basin mein girayi aur phir vapis kamre mein aa gayi. Kamre mein aakar cup vaapis tray par rakha aur chup chap vahin bistar ke kinare khadi ho gayi.

Kuchh pal baad hi thakur bhi bathroom se nanga hi bahar aa gaya. Ek pal ke liye thakur ne usko dekha aur phir uski taango ki taraf nazar daali. Vo ishara samajh gayi aur chup chap apni kameez uper uthakar salwar ka nada kholne lagi.

Jab tak salwar ka nada khulta, thakur uske pichhe aa chuka tha. Salwar dheeli hote hi pichhe se thakur ne uski salwar ko pakadkar halka sa neeche khinch diya aur uski gaand ko nanga kar diya. Kamre mein chal rahe A.C. ki thandi hawa aur thakur ka geela haath uski nangi gaand mein ek thandak ki sihran dauda gaya. Thakur thoda aur nazdeek aaya toh khada lund uski gaand se ragadne laga. Aage kya karna hai vo jaanti thi aur apne haath bistar par rakhkar jhuk gayi.

Pichhe se thakur ne apna lund nishane par lagaya aur dheere dheere poora ka poora uski choot mein daakhil kar diya. Lund ke poora andar hote hi khud uske munh se bhi ek aah nikal padi. Bhale vo kitna apne dil ko samjhati, kitna sharafat ke pardon mein chhupti, vo ye baat achhi taraf se janti thi ke khud uska jism bhi usko dokha de jata tha. Aur aaj bhi kuchh aisa ho raha tha. Thakur pichhe se uski choot par dhakke laga raha tha aur vo khud bhi behekti ja rahi thi.

Ek nazar usne kamre mein full size mirror par daali toh khud uska josh duguna ho gaya. Vo bistar ke kinare par haath rakhe jhuki khadi thi. Salwar dheeli halki si neeche ho rakhi thi. Bas itni hi ke thakur ke liye pichhe se lund daalna mumkin ho sake. Usko khud apne jism ka koi hissa sheeshe mein nazar nahi aa raha tha par phir bhi vo is waqt ek tarah se poori nangi thi.

Thakur ki speed badhti chali gayi aur dhakko mein duguni raftar aa gayi. Gaand par pad rahe poore zor ke dhakko ke karan uske paon ladkhada gaye aur vo bistar par aage ki aur hui aur ulti let gayi. Ab thakur uski gaand par betha tha aur uske dono koolho ko pakde poori jaan se dhakke laga raha tha. Vo janti thi ke kaam khatam hone wala hai. Tezi se padte dhakko ne uski choot mein jaise aag si laga di. Dono haathon se uske apni mutthi mein chadar ko zor se pakad liya aur aankhen moond li ...... aur jaisi uski choot se nadiyan beh chali.

Aur theek usi waqt thakur ke munh se zor ki aah nikli aur lund se nikla veerya uski choot mein bharne laga. Vo khud bhi jhad rahi thi, choot ki garmi paani aur veerya bankar uski choot se beh rahe tha.

Thodi der baad haath mein tray uthaye, apne kapde theek karti vo kamre se bahar nikli. Uspar ek nazar daalte hi koi bhi keh sakta tha ke vo abhi abhi chudkar aayi hai par nazar daalne wala tha hi kaun. Chup chap vo kitchen tak pahunchi aut tray vahin chhodkar apne kamre ki taraf badh chali. Kamre mein jakar usne ek chhoti si goli pani ke saath khaayi taaki usko thakur ka bachcha na thehar jaaye aur bistar par let gayi.

Thodi hi der baad poori haweli ek cheekh ki aawaz se goonj uthi.

Neend ki ubaasi leti vo apne kamre ki taraf badhi. Drawing room mein ghadi par nazar daali toh 9.15 baj rahe the. Yun to vo aksar raat ko der tak jaagti rehti thi par aaj subah se hi kaam itna zyada tha ke halat kharab ho rakhi thi.

Apne kamre tak pahunchkar vo andar daakhil hone hi lagi thi ke yaad aaya ke dopahar ke sukhaye kapde abhi bhi haweli ke pichhle hisse mein ab bhi sookh rahe hain. Ek pal ko usne socha ke kapde subah jaakar le aaye par vo janti ke bahar aasman par badal chhaye hue hain aur raat ko barish ho sakti thi. Mauasm ko kosti vo haweli ke pichhle darwaze ki taraf chali.

Bahar aakar usne ek ek karke apne saare kapde utaare. Jahan vo khadi thi vahan se thakur ke kamre ki khidki saaf nazar aati thi. Kamre ki light jali hui thi.

Kapde lekar vo vapis andar jaane lagi toh ek nazar thakur ke khidki par phir padi aur kamre ke andar usko thakur khade hue dikhai diye. Yun to ye koi khaas baat nahi thi kyunki kamra khud unhi ka tha par jis baat ne uske pair rok diye vo the unke chehre par aate jaate hue bhaav. Lag raha tha jaise khaasi takleef mein hai. Kamre ki khidki zara oonchi thi isliye usko sirf unka sar aur kandhe nazar aa rahe the jo nange the par is baat ka andaza usko ho gaya ke thakur sahab uper se nange the. Doosri baat jo usko thoda ajeeb lagi ke unka poora jism hil raha tha aur chehre ke bhaav badal rahe the.

Jaane kya sochkar vo khidki ke thoda nazadeek aayi. Kyunki khidki uske khud ki height se oonchi thi isliye jab vo khidki ke paas aakar khadi hui toh andar kuchh bhi dikhai dena band ho gaya. Par tabhi uske kaano mein ek aawaz padi jisske uske dono kaan khade ho gaye. Aawaz ek aurat ki thi. Thodi der khamoshi hui aur phir se vahi ek aurat ki aawaz aayi, aur phir aayi, aur phir aayi aur phir ruk ruk kar aawaz aati rahi.

Vo ek min tak chup chap khadi vo aawaz sunti rahi. Ek pal ke liye uske kadam vaapis haweli ke darwaze ki aur badhe aur phir na jaane kyun ruk gaye.Vo achhi tarah jaanti thi ke kamre ke andar kya ho raha hai aur ek aurat is tarah ki aawaz kis waqt nikalti hai. Vo samajh gayi thi ke kyun thakur ke kandhe nange the aur kyun unke chehre ke bhaav badal rahe the.

"Andar kamre mein vo aurat thakur sahab se chud rahi hai"

Ye khyaal dil mein aaya hi tha ke uske jism mein ek sansani si daud gayi. Ghutne jaise kamzor padne lagi aur taango ke beech ki jagah apne aap geeli si hone lagi. Usko khud ko yaad nahi tha ke vo aakhri baar kab chudi thi. Aksar raat ko choot mein ek ajeeb bechaini si hoti aur vo yun hi karwaten badalti rehti thi aur kabhi kabhi takiya uthakar apni taango ke beech daba leti thi. Uska ek haath apne aap hi uski choot par chala gaya aur usne paas pada ek pathar ludhka kar khidki ke paas kiya. Ek paon usne pathar par rakha aur dheere se khidki se jhaank kar andar dekha.

Andar ka majra dekhkar uske munh se aah nikalte nikalte reh gayi. Ek aurat bistar par ulti padi hui thi aur thakur sahab nange uske uper sawar the. Aurat ne apne chehra bistar mein ghusa rakha tha aur thakur ke har dhakke par ghuti ghuti si aawaz nikalti thi. Bistar par chadar bichhi hone ke karan aur us aurat ke ulti hone se vo chahkar bhi ye ne dekh paayi ke bistar par kaun chud rahi hai. Aurat ne kapde poore pehen rakhe the par jis tarah se thakur sahab ne uski gaand pakad rakhi thi aur dhakke laga rahe the vo samajh gayi ke andar bistar par padi aurat ne salwar neeche sarka rakhi thi aur thakur pichhe se choot maar rahe the.

Vahin khade khade usne apna ek haath apni choot par ragadna shuru kar diya aur dhyaan se Thakur ka nanga jism dekhne lagi. Chaude kandhe, kasrati aur tana hua shareer, vo daad diye bina na reh saki. Dheere dheere uski nazar thakur ki taango ke beech pahunchi aur uske dil mein chaah uthi ke ek baar thakur ka lund dikhai de. Par vo toh us aurat ki gaand ke andar kahin chhupa hua tha. Vo bahar khadi besabri se intezaar karne lagi ke chudai ka khel khatam ho aur thakur lund bahar nikale taaki vo usko lund ke darshan ho saken. Thaukur ka shaandaar Jism dekhkar uske dimag mein sirf Thakurain ke liye afsos aur thakur ke liye hamdardi aayi.

Isi intezaar mein vo bahar khadi choot par haath chala rahi thi ke Thakur ne ek jhatka poore zor se mara aur bistar par padi aurat ne dard aur maze ke karan ek pal ke liye apna chehra uper kiya. Bahar khade uska haath fauran choot par chalna band ho gaya. Usko aankhen hairat se phelti chali gayi. Usko yakeen nahi hua ke bistar par vahi aurat hai jo usko ek pal ke liye laga ke hai. Usko yakeen tha ke uski aankhen dhokha kha rahi hai. Usne phir gaur se dekhne ki koshish mein apni nazar andar gadayi par nazar thakur ki taangon ke beech nahi, us aurat ke chehre ki taraf thi.

Achanak usko apne pichhe kuchh aawaz mehsoos hui. Kisi ke chalne ki aawaz thi jo nazdeek thi aur vo samajh gayi ki koi isi taraf aa raha tha. Jaldi se vo khidki se hati aur haweli ke darwaze ki taraf badhi. Dimag ab bhi hairat mein tha ke kya sach mein thakur ke bistar par vahi aurat hai jo usko laga ke hai? Yahi sochti vo apne kamre tak pahuchi.

Thodi hi der baad poori haweli ek cheekh ki aawaz se goonj uthi.

"Aaahhhh ... Aur zor se"

Neeche leti hui maze mein aahen bharte hue boli. Tejvinder uske uper leta hua tha. Vo dono hi poori tarah nange the. Rekha ki dono taange hawa mein, taango ke beech Tejvinder, dono chhatiyan Tejvinder ke haathon mein aur lund choot mein tezi se andar bahar ho raha tha.

Rekha ki umar 40 ke paar thi, shakal soorat bhi koi khaas nahi par jism aisa tha ke 20 saal ki ladki ko maat de jaaye aur yahi vajah thi ke Tej har raat usi ke paas khincha chala aata tha. Yun to bazaar mein ek se badhke ek haseen thi par Rekha ko chodne ke baas shayad hi kabhi aisa hua tha ke Tej kisi aur Randi ke paas gaya tha.

"Kamal hai teri choot" Vo poori jaan se dhakke maarta hua bola "Saala lund ghusao toh aisa lagta hai jaise kisi 15-16 saal ki ladki ki choot mein lund ghusaya ho"

"Toh aapka lund kaun sa kam hai. Jo aapke neeche se nikal gayi, kasam khaake kehti hoon ke kisi aur ke saamne apna bhosda kholegi nahi" Muskurate hue Rekha ne jawab diya

"Tum toh kholti ho" Tej ne usko chhedte hue kaha

"Aap roz raat aane ka wada kijiye. Kasam hai mujhe agar is choot ki hawa bhi kisi aur lund ko lage"

Uski baat sunkar Tej halka sa hasa aur phir poori jaan se dhakke lagane laga

"Aaaahhhh Thakur sahab dheeere ..... "Rekha ki munh se nikla par Tej nahi ruka aur agle 5 minute tak usne Rekha ka jaise bistar par pagal bana diya. Kabhi choochiyan dabata, kabhi choosta, kabhi kaat leta, kabhi dono taange hawa mein hoti to kabhi bistar par par dhakko ki tezi mein koi kami nahi aayi. Aakhir 5 min baad Tej thak kar saans lene ke liye ruka. Vo ruka to Rekha ki jaan mein bhi jaan aayi.

"Thakur sahab" vo haanfti hui boli "Meri choot kya aaj raat gaon chhodkar ja rahi hai jo aise chod rahe ho"

Tej haste hue apne maathe se pasina ponchhne laga

"Thak gaye hain" Rekha ne pyaar se baalon mein haath phirate hue kaha "Main uper aa jaoon?"

"Randi hokar thakuron ke uper aane ka sapna dekh rahi ho?" Tej ne kaha

Ye baat jaise Rekha ke dil mein nashtar ki tarah chudh gayi. Usne toh pyaar mein aakar Tej se uper aane ko kahi thi taaki vo aaram se neeche let jaaye par uske badle mein jab Tej ka ka jawab suna toh ekdum gusse mein kilas gayi.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:53

खूनी हवेली की वासना पार्ट --2

गतान्क से आगे........................

"रंडी हूँ तो क्या हुआ" वो गुस्से में बोल पड़ी "कम से कम रोज़ रात को अपने जिस्म का सौदा करके कमाती हूँ तब 2 वक़्त की रोटी खाती हूँ. बाप के पैसे पे अययाशी नही करती"

"क्या बोली तू?" तेज उसपे उपेर से हटकर बिस्तर पे बैठ गया

"जो सुना वही बोल रही हूँ" रेखा भी उठकर बैठी और चादर अपने नंगे जिस्म पर लपेटने लगी "मुझे ये याद दिलाने से पहले के मैं एक रंडी हूँ ये सोच लिया करो के मैं फिर भी आपसे बेहतर हूँ. कम से कम मेरे पास अपना ये एक मकान है. आपके पास क्या है? बाप की हवेली और ज़मीन और बड़े भाई के फेंके हुए कुच्छ पैसे जिनपर आप पल रहे हो?"

एक तो शराब का नशा दूसरे रेखा के मुँह से कड़वी सच्चाई. तेज का हाथ उठा और रेखा के मुँह पर पाँचो उंगलियाँ छप गयी.

"थप्पड़ मारता है" रेखा भी गुस्से में आग बाबूला हो उठी "बाप और भाई के टुकड़ो पर कुत्ते की तरह पल रहा है और मुझे थप्पड़ मारता है"

इस बात ने आग में घी का काम किया और तेज के गुस्से का ठिकाना नही रहा.

थोड़ी देर बाद जब अपनी कार में बैठा हवेली की तरफ जा रहा था. पीछे रेखा का वो मार मारकर बुरा हाल करके आया था. गुस्से में उसका दिमाग़ भन्ना चुका था और उसने फ़ैसला कर लिया था के इसी वक़्त अपने पिता से जाकर बात करेगा.

थोड़ी देर बाद वो हवेली में दाखिल हुआ. दरवाजे के पास ही उसको हवेली का पुराना नौकर भूषण मिल गया.

"पिताजी कहाँ हैं?" उसने भूषण से पुछा

"जी अपने कमरे में" भूषण ने कहा

कुच्छ देर बाद तेज अपने पिता ठाकुर शौर्या सिंग के कमरे में खड़ा था. ठाकुर साहब अपने कमरे की चादर ठीक कर रहे थे.

"क्या मतलब के तुम्हें अपना हिस्सा चाहिए?" चादर ठीक करते करते उन्होने तेज से पुछा

"मतलब के मुझे ज़मीन वामीन में कोई दिलचस्पी नही. मेरे हिस्से का जितना बनता है आप मुझसे कॅश में दे दीजिए" तेज अब भी शराब के नशे में था.

"ताकि तुम उसको रंडियों के यहाँ उड़ाते फ़िरो? बिल्कुल नही" ठाकुर साहब ने जवाब दिया.

तेज के गुस्से का पारा आसमान च्छुने लगा.

थोड़ी ही देर बाद पूरी हवेली एक चीख की आवाज़ से गूँज उठी.

"सुनो ना" रूपाली ने पिछे से पुरुषोत्तम के गले में अपनी बाहें डाली

"ह्म्‍म्म्म ... कहो" पुरुषोत्तम अपनी टेबल पर सामने रखे कुच्छ पेपर्स में बिज़ी था

रूपाली ने धीरे से पुरुषोत्तम के गले पर किस किया और उसके कान को अपने दांतो के बीच लेकर बाइट किया.

"आउच" पुरुषोत्तम ने अपले गले को झटका " क्या करती हो"

"वही जो के आक्च्युयली तुम्हें शुरू करना चाहिए पर उल्टा हो रहा है. तुम्हारा काम मैं कर रही हूँ और मेरे डाइलॉग तुम बोल रहे हो"

"शाम के 8 बज रहे हैं. थोड़ी देर में डिन्नर लग जाएगा. ये कोई टाइम है भला?"

"प्यार का कोई टाइम नही होता" रूपाली पिछे से पुरुषोत्तम के साथ चिपक गयी और अपनी चूचियाँ उसके कंधो पर रगड़ने लगी.

"नही नही नही ..... " पुरुषोत्तम ने उसकी बाहें अपने गले से निकाली और फिर पेपर्स में सर झुका कर अपना काम करने लगा,

रूपाली ने उसके गले से बाहें निकाली और थोड़ा पिछे होकर अपना सारी खोलनी शुरू कर दी. उसने नीले रंग की सारी प्लेन पहेन रखी थी. सारी उतारकर वहीं ज़मीन पर गिरा दी और एक ब्रा और ब्लाउस में पुरुषोत्तम के सामने आ खड़ी हुई.

पुरुषोत्तम ने नज़र उठाकर अपनी बीवी की तरफ देखा. नीले रंग का ब्लाउस और पेटिकट उसके गोरे रंग के साथ जैसे ग़ज़ब ढा रहा था. 36 साइज़ की बड़ी बड़ी चूचियाँ ब्लाउस फाड़ कर बाहर आने को उतावली हो रही थी. नीचे गोरा मखमली पेट जिसपर चरबी का निशान तक नही थी. लंबी सुडोल टांगे और किसी पहाड़ की तरफ शानदार तरीके से उठी हुई गांद. सामने अगर ऐसी औरत आधी नंगी चुदवाने के लिए खड़ी हो तो किसी नमार्द का भी लंड जोश मार जाए, पुरुषोत्तम तो खैर उसका पति था.

वो रूपाली की ओर देखकर मुस्कुराया और रूपाली उसकी और. पुरुषोत्तम एक कुर्सी पर बैठा हुआ था और रूपाली ठीक उसके सामने खड़ी थी. उसने आगे बढ़कर उसके नंगे पेट पर अपने होंठ टीका दिए और पेटिकट का नाडा खोल दिया.

रूपाली ने नीचे पॅंटी नही पहेन रखी थी. पेटिकट सरसारा कर उसके कदमो में जा गिरा और वो कमर के नीचे से नंगी हो गयी. जिस्म पर अब सिर्फ़ एक ब्लाउस बचा था.

पुरुषोत्तम ने एक नज़र अपनी बीवी की नंगी चूत पर दौड़ाई. वो पहले चूत क्लीन शेव रखती थी पर पुरुषोत्तम के कहने पर अब हल्के हल्के से बॉल रखती थी. पुरुषोत्तम ने धीरे से अपने एक हाथ रूपाली की चूत पर फेरा और दूसरे हाथ से उसकी गांद सहलाने लगा.

रूपाली से एक हल्का सा टच भी बर्दाश्त ना हुआ और वो फ़ौरन घुटनो पर जा बैठी. पुरुषोत्तम एक कुर्सी पर बैठा हुआ था. रूपाली ने जल्दी जल्दी उसकी पेंट के हुक्स खोलने शुरू कर दिए. आगे जो होने वाला था वो पुरुषोत्तम जानता था. उसने अपना जिस्म कुर्सी पर ढीला छ्चोड़ दिया और आँखें बंद करके बैठ गया.

रूपाली ने उसकी पेंट खोलकर लंड बाहर निकाला और धीरे धीरे सहलाने लगी. मुरझाए हुए लंड में हल्का सा हाथ फिराते ही जान आने लगी और उसका साइज़ बढ़ने लगा. रूपाली आगे को झुकी और अपनी जीब लंड पर फिराने लगी. उसकी जीभ लंड पर ऐसे हिल रही थी जैसे कोई बिल्ली दूध पी रही हो. नीचे एक हाथ लंड को हिला रहा था और दूसरे पुरुषोत्तम के टटटे सहला रहा था.

"आअहह रूपाली" जैसे ही रूपाली ने उसका लंड अपने मुँह में भरा, पुरुषोत्तम के मुँह से आह निकल पड़ी.

रूपाली ने पूरा लंड अपने मुँह में लिया और टटटे सहलाते हुए लंड को चूसना शुरू कर दिया. उसका सर लंड पर तेज़ी के साथ उपेर नीचे होने लगा. मुश्किल से एक मिनट भी नही हुआ था के पुरुषोत्तम का जिस्म एक पल के लिए काँप उठा और इससे पहले के रूपाली कुच्छ समझ या कर पाती, उसके मुँह में वीर्य की एक धार आ लगी.

"रूको" रूपाली ने लंड फ़ौरन अपने मुँह से बाहर निकाला पर देर हो चुकी थी. कुच्छ वीर्य उसके मुँह में और कुच्छ लंड बाहर निकलते ही उसके चेहरा और ब्लाउस पर आ गिरा.

"आइ आम सॉरी" पुरुषोत्तम ने आँखें खोली और रूपाली की तरफ देखा. रूपाली ने कहा कुच्छ नही पर जिस तरह से वो देख रही थी वही पुरुषोत्तम के लिए काफ़ी था.

"आइ आम सॉरी मैं रोक नही पाया. वी कॅन डू इट अगेन इन दा नाइट" वो बोला

रूपाली ने उठकर टेबल पर रखे पुरुषोत्तम के रुमाल से अपने मुँह और चेहरे पर गिरे वीर्य को सॉफ किया, पेटिकट कमर पर बँधा और सारी पहेन्ने लगी. तभी उसको अपने ब्लाउस पर पड़े पुरुषोत्तम के वीर्य के धब्बे नज़र आए इसलिए उसने सारी और ब्लाउस उतारकर एक तरफ फेंक दिया और एक गुलाबी रंग का सलवार सूट निकालकर पहेन लिया.

"हां ताकि रात को तुम फिर एक मिनट में निपट जाओ और मैं अनसॅटिस्फाइड बिस्तर पर रात भर पड़ी रहूं. है ना?"

"रूपाली" पुरुषोत्तम थोड़े ज़ोर से बोला

"चिल्लइए मत" रूपाली ने भी वैसे ही जवाब दिया "अपनी नमार्दानगी को अपनी आवाज़ के शोर में दबाने की कोशिश मत कीजिए."

"इतनी गर्मी है अगर जिस्म में तो एक सांड़ लाकर बांड दूँ? फिर भी अगर टाँगो के बीच की आग ठंडी ना हो तो कहीं किसी और के पास पहुँच जाओ"

पुरुषोत्तम ने कहा और गुस्से में पैर पटकता कमरे से बाहर निकल गया. वो हवेली से बाहर आया और अपनी कार निकालकर गुस्से में बाहर चला आया. रास्ते में वो एक शराब की दुकान पर रुका, एक बॉटल खरीदी और गाओं से बाहर नहर के किनारे आ गया. उसने कार एक अंधेरी जगह पर रोकी और बाहर कार के बोनेट पर बैठ कर दारू पीने लगा.

वो खुद जानता था के बिस्तर पर वो अपनी बीवी को खुश करने में नाकाम है, उसको प्रिमेच्यूर ईजॅक्युलेशन की बीमारी थी और अक्सर रूपाली से पहले ही उसका काम ख़तम हो जाता था. कई बार उसने सोचा के किसी डॉक्टर के पास जाए पर वो इस इलाक़े के ठाकुर खानदान का सबसे बड़ा लड़का था. अगर बात फैल जाती के ठाकुर पुरुषोत्तम को नमार्दानगी की बीमारी है तो वो कहीं मुँह दिखाने लायक ना रहता. इसी डर से वो कभी किसी डॉक्टर के पास भी ना जा सका.

कोई एक घंटे बाद वो शराब के नशे में धुत वापिस हवेली पहुँचा. कार बाहर खड़ी करके वो हवेली में दाखिल हुआ और अपने कमरे की तरफ बढ़ा. उसका कमरा फर्स्ट फ्लोर पर था. वो किसी तरह सीढ़ियाँ चढ़कर उपेर पहुँचा पर फिर नौकर को डिन्नर कमरे में ही सर्व करने के बोलने के इरादे से वो रुका और फिर नीचे किचन की तरफ बढ़ चला.

अचानक ही पवर कट हुआ और पूरी हवेली अंधेरे में डूब गयी. पुरुषोत्तम ध्यान से सीढ़ियाँ उतर रहा था. ड्रॉयिंग हॉल में पूरा अंधेरा था. अचानक उसने देखा था हॉल के दूसरी तरफ उसके पिता के कमरे का दरवाज़ा खुला और एक औरत कमरे से बाहर निकली. अंधेरा होने की वजह से सिर्फ़ अंदर ठाकुर के कमरे से आती हल्की रोशनी में वो औरत उसको नज़र आई. उस औरत का चेहरा उसको अंधेरे की वजह से दिखाई नही दिया.

"अर्रे सुनो" कहते हुए ठाकुर साहब ने हल्का सा दरवाज़ा खोला. हल्की सी रोशनी में पुरुषोत्तम को अंदाज़ा हो गया था के उसका बाप सिर्फ़ एक अंडरवेर में है.

"तुम ये भूल गयी थी कल. ये ले जाओ" कहते हुए उसके बाप ने उस औरत के हाथ में एक ब्रा थमा दी.

जहाँ पुरुषोत्तम खड़ा था वहाँ से उसको उस औरत के पीठ नज़र आ रही थी. ठाकुर के कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही फिर अंधेरा हो गया. बाहर निकली औरत कौन थी ये तो वो देख नही सका पर कमरे से आती हल्की सी रोशनी में उसने ये ज़रूर देख लिया था के उसने एक गुलाबी रंग का सलवार कमीज़ पहेन रखा था और उस सलवार कमीज़ को पुरुषोत्तम बहुत खूब पहचानता था.

वो औरत कमरे से निकलकर किचन की तरफ बढ़ चली.

थोड़ी ही देर बाद पूरी हवेली एक चीख की आवाज़ से गूँज उठी.

भूषण अपने कमरे में बैठा हुआ था के टेबल पर रखी घंटी बज उठी. इसका मतलब सॉफ था. के ठाकुर साहब ने उसको याद किया है.

भूषण हवेली में पिच्छले 40 साल से नौकरी कर रहा था. उसकी उमर 70 के पार थी. इससे पहले उसके पिता ठाकुर खानदान के खेत में पहरा दिया करते थे. बाद में भूषण ने हवेली में काम करना शुरू कर दिया और फिर वहीं का होकर रह गया. हवेली के बाहर कोने में एक छ्होटा सा कमरा उसका था जहाँ वो अकेला रहता था.

वो धीरे धीरे चलता हवेली में दाखिल हुआ और ठाकुर साहब के कमरे में पहुँचा. अंदर ठाकुर और ठकुराइन दोनो ही कमरे में मौजूद थे. ठाकुर उस वक़्त बाथरूम में थे और ठकुराइन सरिता देवी अपनी व्हील चेर पर बिस्तर के पास बैठी थी.

"हुकुम मालिक" भूषण ने कहा

"गाड़ी निकालो. अभी इसी वक़्त" ठाकुर ने बाथरूम के अंदर से कहा

भूषण ने एक नज़र सरिता देवी पर डाली और दूसरी नज़र घड़ी पर.

"रात के इस वक़्त कहाँ जाएँगे" उसने मंन ही मंन सोचा पर ये पुच्छने की हिम्मत नही हुई. वो चुपचाप जी मालिक कहकर कमरे से बाहर निकल आया.

ये कयि सालों का दस्तूर था के ठाकुर शौर्या सिंग के गाड़ी भूषण ही चलाता था. वो खुद काफ़ी बुड्ढ़ा हो चुका था और नज़र भी काफ़ी कमज़ोर हो चली थी पर ठाकुर साहब सिर्फ़ उसी की ड्राइविंग पर यकीन रखते थे.

धीरे धीरे भूषण पार्किंग लॉट तक पहुँचा. कुल मिलकर वहाँ 10 गाड़ियाँ खड़ी थी, सब इंपोर्टेड. वो ठाकुर साहब की मर्सिडीस तक गया और चाबी निकालने के लिए अपनी जेब में हाथ डाला तो याद आया के चाबी खुद ठाकुर के पास ही थी. वो आज दिन में गाड़ी कहीं खुद लेकर गये थे और तबसे चाभी उन्ही के पास थी. वो फिर ठाकुर के कमरे की तरफ वापिस चला.

क्रमशः........................................