लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

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The Romantic
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Re: लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 02 Nov 2014 13:48


"बस सर, अब वो वो ... जल थेरपी ... सिखा दो ?" उसकी आवाज थरथरा रही थी।
"ह ... हाँ ... ठीक है ... च ... चलो बाथ रूम में चलते हैं" मुझे लगा मेरा भी गला सूख गया है। मैं तो अपने प्यासे होंठों पर अपनी जबान ही फेरता रह गया।
उसने नीचे झुक कर फर्श पर पड़ी ब्रा और टॉप उठा लिया और अपनी छाती से चिपका कर उन नन्हे परिंदों को छुपा लिया और बाथरूम की ओर जाने लगी। मैं मरता क्या करता, मैं भी उसके पीछे लपका।
बात रूम में आकर मैंने गीज़र से एक बाल्टी में गर्म और दूसरी में ठण्डा पानी भरा और दो सूखे तौलिये उनमें डुबो दिए। पहले मैंने गर्म तौलिये से उसके उरोजों की सिकाई की बाद में ठण्डे से। जैसे ही ठण्डा तौलिया उसके उरोजों पर लगता उसके सारे शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती और सारे रोम कूप खड़े से हो जाते। मैंने उसे भाप सेवन (स्टीम बाथ) के बारे में भी समझाता जा रहा था। वह तो आँखें बंद किये मेरे हाथों का स्पर्श पाकर मदहोश ही हुए जा रही थी। उसके पतले पतले होंठ अब गुलाबी से रक्तिम हो कर कांपने लगे थे। एक बार तो मन में आया कि इनको चूम ही लू। मेरा अनुमान था वो विरोध नहीं करेगी। सिमरन की तरह झट से मुझे बाहों में जकड़ लेगी। सिमरन का ख़याल आते ही मेरे हाथ रुक गए।
आप तो जानते हैं मैं सिमरन से कितना प्रेम करता था। मैं भला ऐसी जल्दबाजी और अभद्रता कैसे कर सकता था। भले ही मेरे मन में उसका कमसिन बदन पा लेना का मनसूबा बहुत दिनों से था पर मैं सिमरन के इस प्रतिरूप के साथ ऐसा कतई नहीं करना चाहता था।
हमें इस जल थरेपी में कोई 15-20 मिनट तो लग ही गए होंगे। मेरे हाथ रुके देख कर पलक को लगा शायद अब जल थरेपी का काम ख़त्म हो गया है।
"और नहीं करना ?"
"ओह... हाँ बस हो गया ?" मेरे मुँह से निकल गया। मैं तो सिमरन के खयालों में ही डूबा था।
उसने टॉवेल स्टेंड से सूखा तौलिया उठाया और अपने उरोजों को पोंछ लिया। उसने ब्रा दुबारा पहन ली और फिर जल्दी से टॉप भी पहन लिया। अब बाथरूम में रुके रहने का कोई मतलब नहीं रह गया था।
कमरे में आने के बाद मैंने कहा,"पलक एक काम तो रह ही गया ?"
"वो.. क्या सर ?"
"ओह.. तुम्हें इनको चूसवाना भी तो सिखाना था ना ?"
"चाट गेहलो ?"
"मैं सच कहता हूँ इनको चुसवाने से ये जल्दी बड़े हो जायेंगे ?"
"आज नहीं सर, वो कल सिखा देना... अब मैंने ब्रा पहन ली है ?" कह कर वो मंद मंद मुस्कुराने लगी।
ये कमसिन लडकियाँ भी दिखने में कितनी मासूम और भोली लगती हैं पर आदमी की मनसा कितनी जल्दी भांप लेती हैं। चलो एक बात की तो मुझे तसल्ली है कि उसे मेरे मन की कुछ बातों का तो अब तक अंदाज़ा हो ही होगा। अब तो बस इस कमसिन कलि को अपने आगोश में भर कर इसका रस चूस लेने में थोड़ी सी देरी रह गई है। दरअसल मैं कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता था। कहीं ऐसा ना हो कि वो बिदक ही जाए और उसके साथ मेरा प्रथम मिलन का सपना केवल सपना ही बन कर रह जाए। मैं किसी भी हालत में ऐसा नहीं होने देना चाहता था।
"सर ...मुझे बहुत देर हो गई है। घर पर वो दादी और बुआ को कोई शक हो गया तो मेरा जीना हराम कर देंगी।"
"क्यों ऐसी क्या बात है?"
"अरे आप नहीं जानते, मैं उनको फूटी आँख नहीं सुहाती। बस उनको तो कोई ना कोई बहाना चाहिए पापा से शिकायत करने का !"
"ओह..."
"चलो छोड़ो... मैं भी क्या बातें ले बैठी ! कल का क्या प्रोग्राम है ?" उसने आँखें फड़फड़ाते हुए पूछा। उसके होंठों पर जो शरारत भरी कातिलाना मुस्कान थिरक रही थी मैं उसका मतलब बहुत अच्छी तरह जानता था।
"तुम बताओ कल कब आओगी?"
"प्रेम क्या तुम मेरे घर पर नहीं आ सकते?" आज पहली बार उसने मुझे प्रेम के नाम से संबोधित किया था।
"पर तुम्हारे घर पर तो वो दादी और पापा भी होंगे ना?"
"ओह... पापा तो कल ही टूर पर चले गए हैं और दादी तो रात को 9 बजे ही सो जाती है !"
"और वो तुम्हारी बुआ?"
"आप भी ना पूरे गहले ही हैं? अरे भई वो तो कभी कभार दिन में ही आती है। आप ऐसा करो कल रात को 10:00 बजे के बाद आ जाना मैं सारी तैयारी करके रखूँगी।"
"कैसी तैयारी?" मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था।
"ओह. आप भी घेले (लोल) हो ! मैं आयल मसाज और जल थैरेपी की बात कर रही थी !" उसके मुँह पर अबोध मुस्कान थी।
"ओह. हाँ ... ठीक है ...."
आप सोच रहे होंगे यह प्रेम गुरु भी अजीब पागल है हाथ आई चिड़िया को ऐसे ही छोड़ दिया साली को पटक कर रगड़ देते ?
दोस्तों ! आप नहीं समझेंगे। मैं भला उसके साथ ऐसी जबरदस्ती कैसे कर सकता था। मेरी मिक्की और सिमरन की आत्मा को कितना दुःख होता क्या आपको अंदाज़ा है?
भले ही पलक नादाँ, अनजान, मासूम और नासमझ है अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार है पर मैं अपनी इस परी के साथ ऐसा कतई नहीं कर सकता। मिक्की और सिमरन के प्रेम में बुझी मेरी यह आत्मा उसे धोखा कैसे दे सकती है। मैं उसकी कोमल भावनाओं से खिलवाड़ कैसे कर सकता था। कई बार तो मुझे लगता है मैं गलत कर रहा हूँ। लेकिन उसका चुलबुलापन, खिलंदड़ी हंसी और बार बार रूठ जाना और बात बात पर तुनकना मुझे बार बार उसे पा लेने को उकसाता रहता है। आदमी अपने आप को कितना भी बड़ा गुरु घंटाल क्यों ना समझे इन खूबसूरत छलाओं को कभी नहीं समझ पाता।
पलक ने मुझे अपना पता बता दिया था और यह भी चेता दिया था कि घर के पास पहुँच कर उसे मिस कॉल कर दूँ, वो दरवाजे पर ही मिल जाएगी।
पलक को मैं नीचे तक छोड़ आया। ऑटो रिक्शा में बैठने के बाद उसने मुझे एक हवाई चुम्बन (फ़्लाइंग किस) दिया। अब आप मेरी हालत समझ सकते हैं कि मैंने वो रात कैसे काटी होगी। मधु से फ़ोन पर एक घंटे सेक्स करने और दो बार पलक के नाम की मुट्ठ लगाने के बाद कोई 2 बजे मेरी आँख लगी होगी। और फिर सारी रात पलक के ही सपने आते रहे। मैंने सपने में देखा कि हम दोनों नदी के किनारे रेत पर चल रहे हैं और पलक खिलखिलाते हुए मेरा चुम्बन लेकर भाग जाती है और मैं उसके पीछे दौड़ता हुआ चला जाता हूँ।
हे लिंग महादेव ! इस नाज़ुक परी के कमसिन बदन की खुशबू कब मिलेगी अब तो बस तेरा ही आसरा बचा है।
कितना अजीब संयोग था पटेल चौक से कोई आधा किलोमीटर दूर सरोजनी नगर में 13/9 नंबर का दो मजिला मकान था। तय प्रोग्राम के मुताबिक़ मैं ठीक 10:00 बजे उसके घर के बाहर पहुँच गया। मैंने टैक्सी को तो पिछले चौक पर ही छोड़ दिया था। अक्टूबर के अंतिम दिन चल रहे थे। गुलाबी ठण्ड शुरू हो गई थी। मैंने पहले तो सोचा था कि कुरता पाजामा पहन लूं पर बाद में मैंने काले रंग का सूट और सिर पर काला टॉप पहनना ठीक समझा। इन दिनों में गुजरात में गणेश उत्सव और नवरात्रों की धूम रहती है। मैंने आज दिन में पूरी तैयारी की थी। मैं आज किसी चिकने चुपड़े आशिक की तरह पेश आना चाहता था। आज मैंने अपनी झांटें साफ़ कर ली थी और रगड़ रगड़ कर नहाया था। मैंने बाज़ार से दो गज़रे भी खरीद लिए थे और अपने कोट की जेब में दो तीन तरह की क्रीम और एक निरोध (कंडोम) का पैकेट भी रख लिया था। क्या पता कब यह हुस्न परी मेरे ऊपर मेहरबान हो जाए।
मैंने अपने मोबाइल से दो बार पलक को मिस काल किया।
वो तो जैसे मेरा इंतज़ार ही कर रही थी। उसने दरवाज़े का एक पल्ला थोड़ा सा खोला और आँखें टिमटिमाते हुए हुए पूछा,"किसी ने देखा तो नहीं ना ?"
"ना !" मैंने मुंडी हिलाई तो उसने झट से मेरा बाजू पकड़ते हुए मुझे अन्दर खींच कर दरवाज़ा बंद कर लिया।
"वो... तुम्हारी दादी?" मैंने पूछा।
"ओह दादी को गोली मारो, वो सो रही है सुबह 8 बजे से पहले नहीं उठेगी। मैंने उसे दवाई की डबल डोज़ पिला दी है। तुम आओ मेरे साथ।" उसने मेरा हाथ पकड़ा और सीढ़ियों की ओर ले जाने लगी।

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Re: लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 02 Nov 2014 13:49


मैं चुपचाप उसके साथ हो लिया। उसके कमसिन बदन से आती मादक महक तो मुझे अन्दर तक रोमांच में भिगो रही थी। शायद उसने कोई बहुत तेज़ इत्र या परफ्यूम लगा रखा था। उसने अपने खुले बालों को लाल रिबन से बाँध कर एक चोटी सी बना रखी थी। सफ़ेद रंग की स्कर्ट के ऊपर कसे हुए टॉप में उसके गोलार्ध उभरे हुए से लग रहे थे। सीढियाँ चढ़ते समय उसके छोटे छोटे गुदाज़ नितम्बों को लचकते देख कर तो यह सिमरन का ही प्रतिरूप लग रही थी। मैं तो यही अंदाज़ा लगा रहा था कि आज उसने ब्रा तो नहीं पहनी होगी पर कच्छी जरुर गुलाबी रंग की ही पहनी होगी। इसी ख़याल से मेरा पप्पू तो अभी से उछल कूद मचाने लगा था।
शायद यह उसका स्टडी रूम था। कमरे में एक मेज, दो कुर्सियाँ और एक छोटा बेड पड़ा था। बिस्तर पर फूल बूटों वाली रेशमी चादर बिछी थी और दो तकिये रखे थे। एक कोने में उसके सफ़ेद जूते फेंके हुए से पड़े थे। मेज के ऊपर एक तरफ कंप्यूटर पड़ा था और साथ में 3-4 किताबें आदि बिखरी पड़ी थी। मेज पर एक कटोरी में शहद और एक में कच्चा दूध पड़ा था। साथ में तेल की दो तीन शीशियाँ और दो सूखे तौलिये भी रखे थे।
वो बिस्तर पर बैठ गई तो मैं पास रखी कुर्सी पर बैठ गया। मैं अभी यही सोच रहा था कि किस तरह बात शुरू करूँ कि पलक बोली- सर, एक बात पूछूं ?
""हम्म्म ...?"
"क्या आप मधुर दीदी के भी चूसते हो?"
"क्या?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा।
"तमे इतला पण भोला नथी कि मारी वात समझया न होय ?" (आप इतने भोले नहीं हैं कि मेरी बात ना समझे हों)
"ओह... हाँ... मैं तो लगभग रोज़ ही चूसता हूँ !"
"शु दीदी ने पण एम मजा आवे छे ?" (क्या दीदी को भी इसमें मज़ा आता है?)
"हाँ उसे तो बिना चुसवाये नींद ही नहीं आती।"
"अच्छा... ऐना बूब्स नु माप शु छे ?" (अच्छा ? उनके बूब्स की साइज़ कितनी है?)
"36 की तो होगी।"
"आने लगन पेला केटली हती ?" (और शादी से पहले कितनी थी?)
"कोई 28 के आस पास !"
"हटो परे झूठे कहीं के ?"
"मैं सच कहता हूँ मैंने उन्हें चूस चूस कर इतना बड़ा किया है !"
वो कुछ सोचने लगी थी। मैं उसके मन की उथल पुथल अच्छी तरह समझ सकता था। थोड़ी देर बाद उसने अपनी मुंडी को एक झटका सा दिया जैसे कुछ सोच लिया हो और फिर उसने बड़ी अदा से अपनी आँखें नचाते हुए पूछा,"वो... आज पहले मालिश करेंगे या....?"
"पलक अगर कहो तो आज तुम्हें पहले वो ... वो ...?" मेरा तो जैसे गला ही सूखने लगा था।
"सर, ये वो.. वो.. क्या होता है ?" मेरी हालत को देख कर मुस्कुरा रही थी।
"म ... मेरा मतलब है कि तुम्हें वो बूब्स को चुसवाना भी तो सिखाना था ?"
"हाँ तो ?"

कहानी जारी रहेगी !
प्रेम गुरु नहीं बस प्रेम

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Re: लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 02 Nov 2014 13:50


"पलक अगर कहो तो आज तुम्हें पहले वो ... वो ...?" मेरा तो जैसे गला ही सूखने लगा था।
"सर, ये वो.. वो.. क्या होता है ?" मेरी हालत को देख कर मुस्कुरा रही थी।
"म ... मेरा मतलब है कि तुम्हें वो बूब्स को चुसवाना भी तो सिखाना था ?"
"हाँ तो ?"
"क्यों ना आज शुरुआत उसी से की जाए ?" मैंने डरते डरते कहा, मैं जानता था कि वो मना कर देगी। लडकियाँ कितनी भी मासूम क्यों ना हों पर इन बातों को झट से समझ जाती हैं।
पर मेरी हैरानी की उस समय सीमा ही नहीं रही जब उसने कहा,"ठीक है गुरूजी ... जैसा आप बोलें। पर कुछ और मत कर बैठना !" वो अपनी मोटी मोटी आँखें झपकाते हुए मंद मंद मुस्कुराने लगी।
मेरा दिल तो बल्लियों ही उछलने लगा था। मैंने अपना कोट और जूते उतार दिए। मेरे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि मुझे कैसे शुरुआत करनी चाहिए। आज मुझे लगने लगा था कि मैं अपने आप को प्रेम गुरु झूठ ही समझता रहा हूँ। इस कमसिन बला के सामने मेरी हालत इस तरह खराब हो जायेगी मैंने सोचा ही नहीं था।
"सर एक बात पूछूं ?"
"ओह्हो ... पलक तुम मुझे सर मत बोला करो।"
"क्यों ?"
"जब तुम सर बोलती हो तो मुझे लगता है मैं किसी सरकारी स्कूल का मास्टर हूँ !"
"वो.. वो... मिक्की आपको क्या कह कर बुलाती थी?"
"वो तो मुझे जीजू कह कर बुलाती थी।"
"क्या मकाऊ (मरुस्थल का ऊँट) नहीं बुलाती थी?" कह कर वो हंसने लगी।
"ओह ... पलक तुम बड़ी शरारती हो गई हो !"
"कैसे?"
"मकाऊ तो सिमरन बुलाती थी।"
"ओह हाँ ... तो मैं आपको फूफाजी बुला लिया करूँ?" वो जोर जोर से हंसने लगी।
मैंने उसे घूर कर देखा तो वो बोली,"चलो कोई बात नहीं मैं भी आपको अब जीजू ही बुलाऊंगी ... अच्छा एक बात सच बताना?"
"हम्म्म ...?"
"क्या आपको सिमरन और मिक्की की बहुत याद आती है?"
"हाँ.."
"क्या आपको अब भी छोटी छोटी लड़कियाँ अच्छी लगती हैं?"
"पर तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो?"
"ऐसे ही।"
"फिर भी?"
"क्या आप उसे बहुत प्रेम करते थे?"
"हाँ ... पलक ... पर तुम भी तो मेरी मिक्की जैसी ही हो !"
"पर मैं मिक्की की तरह बच्ची तो नहीं हूँ !"
"मैं जानता हूँ मेरी दादी अम्मा, अब तुम बच्ची नहीं बड़ी हो गई हो !" कहते हुए मैंने उसके गालों पर हलकी सी चिकोटी काट ली। भला इतना सुन्दर मौका मैं हाथ से कैसे जाने देता।
"ऊईई आईईईईई....."
"क्या हुआ?"
"हटो परे... ऊँट जीवो...." वो अपने गालों को सहलाती हुई बोली।
बचपन लांघने के बाद यौवन की दहलीज़ पर खड़ी दुबली पतली अधखिली कलियों को पता नहीं बड़ी होने की क्या जल्दी लगी रहती है। काश ये कमसिन कलियाँ कभी फूल ना बने बस यूंही अपनी खुशबू बिखेरती रहें।
एक बात बताऊँ ! देखा जाए तो हम सभी अपनी उम्र के 10 साल पीछे में अपने आपको देखना पसंद करते हैं। अगर कोई औरत 40 की है तो वो हमेशा यही सोचेगी कि काश वो इस समय 30 की ही होती। जब पलक भी 25-26 की हो जायेगी तो यही सोचेगी काश वो 15-16 की ही होती।
"पलक ! छोड़ो इन बेकार बातों को !"
"ठीक है फूफा ...जी ... अर्रर्रर्र ...जीजू .........?"
पलक खड़ी हो गई और उसने बड़ी अदा से अपना टॉप उतार दिया। आज उसने ब्रा नहीं पहनी थी। आज तो उसके उरोज भरे पूरे लग रहे थे। एक ही दिन में उनकी रंगत निखर आई थी। मुझे तो लगा जैसे अभी ये दोनों गुलाबी रंग के परिंदे अपने पंख फैलाकर उड़ जायेंगे। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। मैंने उसकी ओर अपनी बाहें फैला दी। वो शर्माते हुए मेरे पास आ कर खड़ी हो गई और फिर अपनी दोनों टांगें मेरी कमर के दोनों ओर कर के मेरी गोद में बैठ गई। फिर उसने अपना सिर मेरे सीने से लगा दिया। उसके कमसिन बदन की मादक गंध से मैं तो सराबोर ही हो उठा। उसके अधर कांप से रहे थे और वह कुछ घबरा भी रही थी। पर मैं जानता था मेरी बाहों में आकर उसे एक सहारे का बोध तो हो ही रहा था।
उसके अबोध चहरे को देख कर मेरा रोमांच और भी बढ़ गया। उसने अपनी आँखें बंद कर ली। फिर वो अपनी बाहें मेरे गले में डाल कर अपनी गर्दन को पीछे करके झूल सी गई। ऐसा करने से उसके दोनों उरोज तन कर ठीक मेरे मुँह के सामने आ गए। उसके शरीर से मीठी धाराएँ बहने लगी थी और लाज और रोमांच के कारण उसकी आँखें स्वतः मुंद सी गई थी। मैंने एक हाथ से उसकी कमर पकड़ ली और दूसरे हाथ से उसका एक उरोज को पकड़ लिया। अब मैंने धीरे से अपने होंठ उसके चने के जितने बड़े चुचूक पर लगा दिए। पहले मैंने उस पर एक चुम्बन लिया और फिर अपनी जीभ को नुकीला करके उसके एरोला और चूचक पर गोल गोल परिक्रमा की तो पलक ने एक सिसकारी सी ली।
अब मैंने एक उरोज को पूरा का पूरा अपने मुँह में भर लिया और धीरे धीरे चुस्की लगाने लगा। रसीले आम की तरह उसका पूरा उरोज मेरे मुँह में समां गया। अब मैंने अपना एक हाथ उसकी पीठ पर भी फिराना चालू कर दिया। उसके अछूते कुंवारे बदन से आती खुशबू ने तो मुझे इतना उत्तेजित कर दिया था कि मेरा शेर तो खूंटे की तरह पैंट फाड़ कर बाहर आने को होने लगा था। पर वो बेचारा तो उसके नाज़ुक नितम्बों के दबाव से पिस ही रहा था। मैंने अपना हाथ उसकी पीठ से नीचे की ओर ले जाना चालू कर दिया। उसकी मीठी सीत्कार चालू हो गई थी। उसने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ लिया और अपनी छाती की ओर दबाने लगी।
मैं बारी बारी से दोनों उरोजों को चूसता रहा। कभी मैं उसे पूरा मुँह में भर लेता और चूसते हुए धेरे धीरे अपना मुँह पीछे करते हुए उसे थोड़ा सा बाहर निकाल कर फिर से मुँह में पूरा भर लेता।
मैंने उसके उरोज की घुंडी को अपने दांतों के बीच लेकर हल्के से दबाया तो पलक एक जोर की किलकारी मारते हुए जोर से उछली तो मेरा फिसलता हुआ हाथ स्कर्ट में छुपे दोनों नितम्बों की गहरी संकरी खाई से जा टकराया। मुलायम गद्देदार गोल गोल नितम्बों के बीच में फंसी कच्छी पूरी गीली हो गई थी।
पलक के लिए तो यह सब अनूठा और अप्रत्याशित ही था। उसके छोटे छोटे चुचूक तो तनकर नुकीले हो गए थे। मैं कभी उन्हें दांतों से दबाता और कभी उन पर जीभ फिराता। मैं बारी बारी दोनों उरोजों को चूमता चाटता रहा और कभी उन्हें हौले होले मसलता और कभी दबाता। पर पुरुष का स्पर्श तो वैसे भी जवान लड़की को मतवाला बना देता है। पलक तो इतनी रोमांचित हो गई थी कि वो तो मेरी गोद में उछलने ही लगी थी। आप मेरे मिट्ठू की हालत समझ सकते हैं। मुझे लगने लगा अगर यह ऐसे ही मेरी गोद में उछलती रही तो मेरा पप्पू तो पैंट के अन्दर ही वीरगति को प्राप्त हो जाएगा।
मेरे एक हाथ अब फिसल कर उसके वर्जित क्षेत्र तक (जाँघों के बीच फसी उसकी कच्छी के पास) पहुँच गया था। उसकी कच्छी इतनी कसी हुई थी कि मेरा हाथ अन्दर तो नहीं जा सकता था पर मैंने कच्छी के ऊपर से ही जाँघों के बीच उस उभरे हुए भाग को टटोलना चालू कर दिया। कामरस में डूबी उसकी पिक्की तो जैसे फूल सी गई थी। मैंने जैसे ही कच्छी के ऊपर से ही उसके चीरे पर अपनी अंगुली फिराई पलक की किलकारी पूरे कमरे में गूँज गई। अब मैंने अपनी दो अंगुलियाँ उसकी कच्छी के सिरे के अन्दर फसाई तो मेरी अंगुलियाँ उसकी फांकों से जा टकराई। रेशमी बालों और फांकों के गीलेपन का अहसास पाते ही मैं तो जैसे जन्नत में पहुँच गया। अचानक मुझे लगा पलक का बदन कुछ अकड़ने सा लगा है। उसने एक किलकारी मारी और अपने हाथों से मेरा सर पकड़ कर अपनी छाती से दबा दिया। मुझे लगा उसकी पिक्की ने प्रथम रसधार छोड़ दी है। मेरी दोनों अंगुलियाँ किसी गर्म लिसलिसे रस से भीग गई।
अचानक उसने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ा और अपना मुँह नीचे करते हुए अपने रसीले गुलाबी अधरों को मेरे होंठों से लगा कर बेतहाशा चूमने लगी। उसका चेहरा सुर्ख (लाल) हो गया था और आँखों में लालिमा दौड़ने लगी थी। मैंने उसे कसकर अपनी बाहों में भींच लिया। हमारे प्यासे होंठ इस तरह चिपक गए जैसे कोई सदियों से बिछुड़े प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे से चिपके हों। उसके कोमल होंठ मेरे प्यासे होंठों के नीचे जैसे पिसने ही लगे थे। वह उम् उम् करती हुई अपनी कमर और नितम्बों से झटके से लगाने लगी थी।
उसने अब मेरी शर्ट के बटन खोलना चालू कर दिया। वह तो इतनी उतावली हो रही थी कि मुझे लगा इस आपाधापी में मैं कहीं कुर्सी से नीचे ही ना गिर पडूँ। मैंने पलक को रोकते हुए बिस्तर पर चलने का इशारा किया।
फिर तो उसने मुझे इतना जोर से अपनी बाहों में कस लिया जैसे उसे डर हो कि मैं कहीं उससे दूर न हो जाऊँ। मैंने उसके अधरों को अपने मुँह में भर लिया और उसे जोर जोर से चूसने लगा। अब मैं कुर्सी से उठ खड़ा हुआ पर पलक ने अपनी पकड़ नहीं छोड़ी। वो मेरी कमर के गिर्द अपने पैरों को कसे मेरी गोद में चिपकी ही रही।
अब हम बिस्तर पर आ गए और मैंने उसे चित्त लेटाने की कोशिश की पर उसने मुझे अपनी बाहों में भरे रखा। मैं ठीक उसके ऊपर ही गिर पड़ा। हम दोनों ने एक दूसरे को फिर से चूमना चालू कर दिया।पता नहीं कितनी देर हम एक दूसरे को चूमते रहे। उसने फिर मेरी शर्ट के बटन खोल दिए और अपना मुँह मेरे सीने पर लगा दिया। मैंने उसके सर और गालों पर अपना हाथ फिराना चालू कर दिया।
"ओह... जीजू इन कपड़ों को उतार दो ना प्लीज ?"
मैं असमंजस में था। मैं जानता था पलक इस समय अपनी सुधबुध को बैठी है। वो इस समय काम के वशीभूत है। मैं सच कहता हूँ पहले तो मैं किसी भी तरह उसे बस चोदने के चक्कर में ही लगा था पर अब मुझे लगने लगा था मैं इस परी के साथ यह ठीक नहीं कर रहा हूँ। मेरे प्रेम में बुझी मिक्की या सिमरन की आत्मा को कितना दुःख होगा। चलो पलक तो अभी नादान है पर बाद में तो वो जरुर यही सोचेगी कि मैं एक कामातुर व्यक्ति की तरह बस उसके शरीर को पाने के लिए ही यह सब पापड़ बेल रहा था।
"ओह...." मेरे मुँह से एक दीर्घ निस्वास छूटी।
"क्या हुआ?"
"क ... कुछ नहीं !"
"जिज्जू ! एक बात सच बोलूँ ?"
"क्या?"
"हूँ तमारी साथै आपना प्रेम नि अलग दुनिया वसावा चाहू छु। ज्या आपने एक बीजा नि बाहों माँ घेरी ने पूरी ज़िन्दगी वितावी दयिये। तमे मने आपनी बाहो माँ लाई तमारा प्रेम नि वर्षा करता मारा तन मन ने एटलू भरी दो कि हूँ मरी पण जाऊ तो पण मने दुःख न रहे" (मैं तुम्हारे साथ अपने प्यार की अलग दुनिया बनाना चाहती हूँ। जहां हम एक दूसरे की बाहों में जकड़े सारी जिन्दगी बिता दें। तुम मुझे अपनी बाहों में लेकर अपने प्रेम की बारिश करते हुए मेरे तन और मन को इतना भर दो कि मैं मर भी जाऊं तो मुझे कोई गम ना हो)
"हाँ मेरी पलक मैंने तुम्हारे रूप में अपनी सिमरन को फिर से पा लिया है अब मैं कभी तुमसे दूर नहीं हो सकूँगा !"
"खाओ मेरी कसम ?"
"मेरी परी, मैं तुम्हारी कसम खाता हूँ अब तुम्हारे सिवा कोई और लड़की मेरी जिन्दगी में नहीं आएगी। मैंने कितने बरसों के बाद तुम्हें फिर से पाया है मेरी सिमरन !" कह कर मैंने उसे फिर से चूम लिया।

कहानी जारी रहेगी !
प्रेम गुरु नहीं बस प्रेम